तेरे इंतज़ार में

कविता

नीरज अग्रवाल

समर भूमि में भइया, मेरा
कितने सावन बीत गए।
कब बाँधूँगी राखी उसको
यादों में हम भीग गए ।।

सावन भादौ भये दो नयना
मेघा जाके उससे कहना,
प्रेम का धागा लिए खड़ी है
तेरी प्यारी छोटी बहना ।।

भारत माँ की रक्षा करने
सरहद की सीमा पर लड़ने
मात पिता का गौरव बनकर
देशभक्ति पर जीने मरने ।।

छोटी बहन तुझे करती सलाम
भारत माँ के आया काम
भइया मैं इंतजार करूँगी
हर दिन सुबह शाम ।।

भेज रही हूँ, प्रेम का धागा
विजयी भव”श्री हरि से मांगा
एक पल तेरी झलक को तरसूं
हर जन्म में हो तुझसे ये नाता।।

तेरे इंतजार में भइया
अपलक राह निहारे मइया
एक सावन ऐसा आयेगा
राखी बंधाने घर आएगा ।।

रचनाकार
नीरज अग्रवाल
बिलासपुर(कि3G)

मेरा पता
श्री सुरेश अग्रवाल
अपोजिट डॉ अग्रवाल चिल्ड्रन हास्पिटल, मगरपारा रोड, बिलासपुर
(C G)
495001
M-8359067147

राखी

कविता

गरिमा

राखी

पल में गुस्सा

पल में प्यार

ऐसा होता है

भाई बहन

का प्यार

बहुत दिन हुये

नही मिले

भाई बहन

इन्हें मिलाने

आया राखी

का त्यौहार

बहना के

घर आने से

भाई के घर

मे आई बहार

जिससे झूम

मायके के द्वार

हर साल

राखी आती है

न जाने कितनी

यादे दे जाती है

हर साल

दोनो के बीच

प्यार को बढ़ाती है

कोई दूरी इन्हें

रोक नही पाती है

जीवन मे रस भर

जाती है

गरिमा

तुम्हारी यादों में

गीतिका

अम्बरीष मिश्रा

राखी का त्योहार तुम्हारी यादों में,
डूब गया संसार तुम्हारी यादों में,

पिछले बरस हुआ करते थे तुम घर में,
सूना है घर-बार तुम्हारी यादों में।

आँसू कोटि-हजार गिर रहे आँखों से,
मधुवन है अंगार तुम्हारी यादों में।

ले आये पापा अबकी वही मिठाई,
माँ रोती हर-बार तुम्हारी यादों में।

लिए खड़ी हूँ राखी अपने द्वारे पे,
आ जाओ इक बार तुम्हारी यादों में।

चार भाई बैठ गए रक्षाबंधन को,
तुमको रही निहार तुम्हारी यादों में।

चित्र तुम्हारा बसा मेरे मन-मन्दिर में,
आरति रही उतार तुम्हारी यादों में।

छोटी बिटिया मचल गयी है झूले को,
भेज रही मनुहार तुम्हारी यादों में।

अभी प्रतीक्षारत हैं ये अपलक आँखे,
स्वप्नों का बाजार तुम्हारी यादों में।

रात्रि-दिवस तुमको ढूँढूँ कविताओं में,
खुद को भूल-बिसार तुम्हारी यादों में।

अम्बरीष मिश्र
(लखनऊ)

होता एक भाई

गीतिका

सुवर्णा परतानी

होता एक भाई तो राखी बाँधती मैं भी उसे
रेशम की डोर से अब रिश्ते में मैं बाँधू किसे?

करता वो भी मेरी रक्षा करता वो हिफ़ाज़त
तो फिर ना करती मैं प्रभु से कभी कोई शिकायत

माँ पापा का बनता वो एक मज़बूत सहारा
होती भाभी तो लगता हमें माइका भी हमारा

मेरा हर दुःख,हर दर्द वो अपने कंधों पर उठाता
बहते गर आँसु तो मुझे वो छाती से लगाता

सिर पर हाथ होता उसका कोई बुरी बला ना आती
ना सुननी पड़ती किसिकी बातें ना नज़रें मैं यूँ झुकाती

एक भाई जो देता भगवान तो ख़ुशियाँ मैं ख़ूब मनाती
माँ पापा के जीवन में फूलों की बहार छा जाती

ना रहेना पड़ता उनको अकेला ना पल पल वो यूँ हरते
अपने और परायों के बिचमें ना वो हर क्षण यूँ जलते

राखी की क़ीमत अब मैंने जानी है वो बड़ी अनमोल
भाई की कमी जो ना होती तो जीवन होता समतोल

अगले जनम हे प्रभु मुझे एक भाई आप देना
जो कमी रखी इस जीवन में वो पूरी आप कर लेना

माँ,बाप,बहन का एक अटूट सहारा हो जो
जो बदले ना रंग अपने ऐसा दूलारा हो वो

अब गणपति को भाई मानकर राखी बाँधू हर बार
इस जनम का वही है सच्चा निरपेक्ष और निरंकार

सुवर्णा परतानी

हैद्राबाद

यादों का तूफान

कविता

अर्विना गहलोत

आया राखी का त्योहार

खत में हमने भेजा है प्यार।

मोती की लड़ियों में पिरोया।

बहना नेअपना प्यार।

भाई मेरा मान ही रखना।

राखी को बांध ही रखना।

मत देना चाहे उपहार।

करना इतना उपकार।

राखी का धागा कच्चा ही सही ।

पर पक्का बहना का प्यार।

आया राखी का त्योहार।

खत में हमने भेजा है प्यार।

यादों का तूफान

राखी का त्योहार जब भी आता है।

दिल में यादों का तूफान लेके आता है।

एक दिन तिरंगे में लिपटाआया था।

मैंने वीर को श्रृद्धा से सिर नवाया था।

आज भी तेरी याद का दिया जलाया है।

पूजा का थाल भी सजाया है।

तू यादों के झरोखे से आया है।

तेरा चेहरा मेरे जेहन में मुस्कुराया है।

एक पुष्प आज चढ़ाती हूँ ।

तेरी याद में राखी मनाती हूँ।

सरहद पर हर जांबाज मेरा भाई है।

उन सब ने मुझसे राखी बंधवाई है।

राखी का त्योहार जब भी आता है।

दिल में यादों का तूफान लेके आता है।

अर्विना गहलोत
शिक्षा एम एस सी वनस्पति विज्ञान
पता D9सृजन विहार एन टी पी सी मेजा
जिला इलाहाबाद
रचना स्वरचित है

रक्षा बंधन

गीत + मुक्तक

अनुराधा पाण्डे

गीत

महज लघु डोर मत समझो,अचल यह नेह का बंधन ।
बहन के मान रक्षा हित,निछावर कोटिशः जीवन ।

बहन ने बाँध दी राखी,अमर चिर वो कलाई है ।
बहन जिसकी न होती वो,बड़ा अभिशप्त भाई है ।
वही है धन्य भाई भी,बहन का नेह जो पाता –
सुरभि बाँटा करे बहना,महकता नित्य घर आँगन ।
बहन के मान रक्षा हित —

बिहँस कर माथ भाई के,बहन टीका लगाती जब ।
मृदुल ले थाल हाथों में,मगन कुंकुम सजाती जब ।
लगे तक व्यर्थ सब वैभव,बहन की प्रीत के आगे–
पुलक उर पुष्प खिल जाते,लरजता भग्न मन कानन।
बहन के मान रक्षा हित —

उदासी सोख लेती है ,मधुर मुस्कान है राखी ।
कलुष अघ स्वार्थमय जग में,सतत अम्लान है राखी।
शिकन पड़ने न देती यह,कभी भी माथ भाई के-
बहन के वास्ते हँसकर,कराती प्राण मन अर्पण ।
बहन के मान रक्षा हित,निछावर कोटिशः जीवन ।

मुक्तक।

रक्षा बंधन भी बीत गए,मैं बहना ! तुझ तक आ न सका ।
सिर पर टीका लगवा न सका,कर में राखी बँधवा न सका ।
अगणित बहनों की खातिर पर,चिर उनकी लाज बचाने हित –
मै सरहद पर दिन रैन डटा,रण छोड़ गाँव को जा न सका ।

तुम गई हाथ में डोर बाँध,हो गया हृदय में अचल नेह ।
यह बंधन ही है जगत सार,इससे बढकर क्या प्राण देह ?
राखी भर जाती है अजान,भाई के तन में बल अकूत-
बहना के उर का अजर बिम्ब,कर जाता सचमुच है विदेह।

अनुराधा पाण्डेय
नई दिल्ली

प्यार भरा अनमोल रतन

कविता

विक्की रंजन

शंखो में नहीं …न सीपों में…
न सागर… न ही द्वीपों में…
जिस मोती से लिपटा रेशम…
यह उस प्यार का मोती है जो,
मिलता है प्यारी बहनों में…।
शंखो में नहीं …न सीपों में…

सोने की नहीं… न हीरे की…
न उजियारे…न अँधेरे की…
यह उस दीप की ज्योति है जो,
चमके किस्मत घेरे में…।
शंखो में नहीं …न सीपों में…

न चंदन है… न वंदन है…
जन्म दिया जिस माँ ने…बहन को…
चरणों में उसके…मेरा जीवन अर्पण है…
किस्मत से मिल जाए जिसे…
यह बहन…प्रेम रत्न धन है…।

बंधन ही नहीं… न कंगन है…
यह शान है उसकी,जिसकी भी बहन है…
यह खुशी न सिर्फ… खुश जीवन है…
जिसका कोई मोल नहीं…,
यह प्यार भरा अनमोल रतन है…।
यह प्यार भरा अनमोल रतन है…।

विक्की रंजन
(टण्डवा,चतरा,झारखण्ड)